Saturday, March 26, 2011

मैं और हम ..

यूं तो रोज़ जीता ही हूँ 'मैं' ,
पर अगर 'हम' साथ जीते तो क्या होता !
यूं तो रोज़ मुस्कुराता ही हूँ 'मैं' ,
पर अगर 'हम' साथ हस्ते तो क्या होता !
यूं तो रोज़ गुनगुनाता ही हूँ 'मैं' ,
पर अगर 'हम' साथ गाते तो क्या होता !
क्यों अब 'मैं' से ही काम नहीं चलता ,
अब लगता है की 'मैं' अगर 'हम' होते तो क्या होता !
यूं तो सुख दुःख अकेले ही थे मेरे ,
पर अगर 'हम' बाँट लेते तो क्या होता !
समय की धारा में कश्ती चला रहा हूँ 'मैं' ,
पर अगर 'हम' साथ होते तो क्या होता !
पर भूल गया हूँ
कि,
'हम' बनाने के लिए 'तुम' भी तो कहीं होगे,
अगर 'तुम' कहीं मिल जाते तो क्या होता . 

Saturday, January 8, 2011

कुछ तो बदल गया हूँ मैं

पहले जैसे था , अब वैसा नहीं रहा हूँ मैं !
जब से आये हो तुम सामने
तब से,
कुछ तो बदल गया हूँ मैं |
आज क्या पहनू की तुम देखो,
आज क्या कहूं की तुम सुनो,
इस कशमोकश में उलझ सा गया हूँ मैं
शायद,
कुछ तो बदल गया हूँ मैं |
जो तुम ना बोलो तो सन्नाटा सा रहता है
कुछ भी बोल दो तो संगीत सा छा जाता है,
तुम्हारे इसी अदा में खो सा गया हूँ मैं,
जो भी हैं,
कुछ तो बदल गया हूँ मैं..

Thursday, September 23, 2010

प्रोजेक्ट और प्यार

चाहा उसको पर इज़हार करना भूल गया , ऑफिस के काम में रात को कुर्सी पर ही झूल गया ,
फिर सोचा कि प्रोजेक्ट की डेडलाइन के बाद बोलूँगा  , इन्क्रीमेंट के बाद ज़रूर मुंह खोलूँगा ,
पर डेडलाइन तो एक्सटेंड हो गयी है, और इन्क्रीमेंट भी १०० रुपयों का हुआ है ,
प्रकाश की गति से बाल झर रहे थे , सीट पर बैठे -२ नित्य कर्म कर रहे थे ,
प्रोपोसल वाला गुलाब कांटा हो चुका था , मैनेजर भी हमसे उब चुका था ,
पर अब,
प्रोजेक्ट तो लाइफटाइम हो गया है , ऑफिस ही हमारा घर हो गया है .
मैनेजर कहता की है की यही शादी कर लो , लाइफटाइम प्रोजेक्ट है यही बस लो ,
हम बोले की अब प्रोजेक्ट ही मेरा प्यार है, यही मेरा घर बार है ...!

Tuesday, May 25, 2010

किसान हल उठाए या बन्दूक


भारत कृषिप्रधान देश
किसान है इसका सर्वेश
वो बाँझ मिटटी से भी लाता अन्न
भरता पेट 
देश का, तर हो जाता सबका मन
तब सब कहते थे,
की जन जन के हो तुम्ही पालनहार
तुमने अपने हल से देखो कैसा किया चमत्कार
पर अब लगता है कि
भारत कृषिप्रधान देश था ,
किसान इसका सर्वेश था
जमीन हडपी गयी वो किसपे बोयेगा
सालो से भूखा वो कैसे सोयेगा
सत्ता कि चक्की में पिस गया
बोना था दाना मिटटी में, खुद ही मिटटी हो गया
घनन घनन कहने से अब तो पानी भी नहीं गिरता
कब तक आस रखे वो खुद ही गिर गया
अपना अस्तित्व बचाने का नहीं मिला कोई हल
तो छोड़ दिया अन्न उगाने वाला हल
सोचा,
बन्दूक की नोंक पर शायद कुछ कर लेगा
पर बाहुबली के आगे वो कहा टिकेगा
अब देखना ये है शायद अब बन्दूक से दाना उगेगा
किसान तो किसान है, हल के बिना भी कब तक जियेगा

Monday, May 24, 2010

कुछ अमीरों की भूख .........

हैं कुछ ऐसे अमीर जिन्हें
कितना भी मिले कम है,
बस एक ही रट है
मुझे और चाहिए, मुझे और चाहिए,
रुपयों की चर्बी चढ़ गयी है
फिर भी आँखें नम है
बस एक ही रट है
मुझे और चाहिए, मुझे और चाहिए,
दाने को तरस रहा है गरीब
पर इन्हें अगर मिले दो चम्मच भी कम,
इसका भी इन्हें गम है
बस एक ही रट है
मुझे और चाहिए, मुझे और चाहिए,
दुःख तो तब होता जब
देश ही होता है इनका निशाना
खोखला कर दिया पर आँखों में नहीं शर्म है
बस एक ही रट है
मुझे और चाहिए, मुझे और चाहिए

Saturday, November 21, 2009

कहाँ गया बचपन ..?

कुछ बदल सा गया अब बचपन
हो गया है इसका आधुनिकरण,
चाँद तो आज भी आता है
पर क्यों नही कोई देखता,
बारिश तो आज भी होती है
पर क्यों नही कोई नहाता,
बुडिया का बाल आज भी बिकता है
पर क्यों नही कोई खरीदता,
क्यों नही कोई बचपन अब
दादी नानी की कहानी सुनता,
जकड गया है बचपन इस आधुनिकता में
घुट कर रह गया है बचपन
विचारोहीन मानसिकता में,
कुछ पल तो जीने दो उन्हें अपना जीवन
मत छीनो उनके दो पल....
दे दो उन्हें उनका बचपन

Friday, September 4, 2009

वाह !क्या हैं ये जीवन

वाह !क्या हैं ये जीवन
निरंतर चलती धारा का है ये प्रीतम
सूखे खेत की दरार है कभी
कभी है सूखा कुआ,
कभी अपने जलते घरों से
का उठता हुआ धुंआ ,
पर..
कभी ठंडी ओस की बूँद है
कभी है ये शीतल हवा,
सिर्फ़ एक मुस्कान ही काफी है
ममता है यही, यही है दवा,
हे प्राणी! मत कर चिंता
अगर आएँगे बाढ से दुःख
तो ज़रूर मिलेंगे सागर से सुख,
क्यूंकि जीवन है सुख दुःख का संगम

निरंतर चलती धारा का है ये प्रीतम

वाह !क्या हैं ये जीवन..........